दस्तूर-ए-जिन्दगीं !

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हर डगर , हर मोड़ की,
दिल में इक निशानी रह गयी ।
चलते-चलते इन राहों में ,
बस यूं ही चलते-चलते…….
ना जाने कब बचपन से जवानी गयी।

मिले कई हमसफ़र इन राहों में ,
कुछ अफसाने बने, कुछ कहानी बन गयी ।
मंजिलें भी करीब थी ,
दिल में भी इक ख़ुमारी थी …….

पर दस्तूर-ए-जिन्दगीं, ख़बर किसको…
फासले कुछ कदम‌ ही थे मंजिलों से,
इक मोड़ कुछ यूं आया,ज़िन्दगी के सफ़र में,
 की ताउम्र चाहत जिसकी,
अब वो मंजिलें परायी हो गयी ।
समझते रहे जिन रास्तों को हम, दर्द का जरिया,
वहीं मेरे हर दर्द में, हमदर्द निकले ।

आने वाले कल की अब फिकर नहीं,
मंजिलों की ख्वाहिश ‌भी गयी ।
वक़्त का मंजर कुछ यूं बदला कि,
अब ये रास्ते ही मेरी मंजिल है,
इन रास्तों से ही आशिकी हो गयी ।।।

© AnuRag

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15 Comments

      1. अगर मैं लिखुंगा तो मेरे शब्द की कुछ यूँ ही होंगे। लेकिन मैं अभी शुरुआती पढ़ाव पर ही हुँ।

        Liked by 1 person

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